जो खुद को न जान पाया
वो क्या सहारा बनेगा
अपने कर्मों का बॊझ न ढो पाया
वो किसी के लिए क्या करेगा
भगवान को जो बाँटते हो
वो क्या धर्म निभाएंगे
खुद अपनी नौका जो न पार लगा पाए
वो डूबते के लिए तिनका क्या बन पाएंगे
पर फिर भी अहंकार के शिखर पर बैठे है
अनजान है इस बात स से ये क्या कर बैठे है
मन की शक्ति का अभाव
कैसे मधुरता लायेगा
एक पक्ष से जीवन जीना
यही तात्पर्य रह जायेगा
जैसे मछली तीनो पहर नहाती
फिर भी न दुर्गन्ध है जाती
जैसे पूजा बिन हो योगी
साधना पूरी कैसे होगी
जन्म लिया तो जीना होगा
सबको एक समान समझना होगा
bahut khoob.
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