Thursday, 10 April 2014

जीवन की गुथ्थी,सुलझती नहीं 
मौत क्यों ज़िन्दगी से,डरती  नहीं । 
पल-पल का  भरोसा नहीं  यहाँ 
क्योँ  रिश्तो  की डोर उलझती रही । 
कल सामने था अपने,तो कद्र  न करी 
आज दूरी बनी  तो दिल पर लगी । 
कहीं  बीते होए कल में खो न जाना 
कि आज को पकड़ना मुश्किल हो जाये । 
आज हम यहाँ कल का क्या पता 
हो न शायद अपनी ये परछाइयाँ । 
प्यार  ही प्यार  सिर्फ जीवन सा सार हो 
तो दिलो में न यूँ  तकरार हो । 


Wednesday, 2 April 2014

ऐसे तो ज़माने का मेला लगा है
पर तन्हाई का आलम बड़ा है 
फूलों में खूशबू ,फ़िज़ा  में पुरवाई 
पर मेरा दिल देता है तेरी गवाही 
हर लम्हा लगे यूं जैसे बरसों  समान
चाहे अब बस तुम्हारा ही साथ
                     चाहत की सीमा  सब्र का बाँध
                     जुदाई के दिन बेचैनी की आँच
                      रिश्तों को और मजबूत बनती है
                      प्यार में दूरी रंग लाती है

Rishtey

रिश्तों की गहराई 
न किसी को समझ आयी 
एक जाल की  तरह कभी 
कभी आज़ाद पतंग 
कभी रेशम की  डोर  
कभी रस्सी का फंदा 
हँसना  भी दुभर 
रोना भी गुनाह 
जाने क्या चाहते है लोग 
अपनेपन  की आड़ में 
ये कैसी जलन 
उलझन है कैसी 
रिश्तों की  पहेली न सुलझे 
उम्र निकलती जा रही है 
मनाने में लोगों  को 
काश मेरे मन का भी मंथन किया होता 
स्वार्थी अपनों ने अगर प्यार समझा होता