Thursday, 10 April 2014

जीवन की गुथ्थी,सुलझती नहीं 
मौत क्यों ज़िन्दगी से,डरती  नहीं । 
पल-पल का  भरोसा नहीं  यहाँ 
क्योँ  रिश्तो  की डोर उलझती रही । 
कल सामने था अपने,तो कद्र  न करी 
आज दूरी बनी  तो दिल पर लगी । 
कहीं  बीते होए कल में खो न जाना 
कि आज को पकड़ना मुश्किल हो जाये । 
आज हम यहाँ कल का क्या पता 
हो न शायद अपनी ये परछाइयाँ । 
प्यार  ही प्यार  सिर्फ जीवन सा सार हो 
तो दिलो में न यूँ  तकरार हो । 


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