रिश्तों की गहराई
न किसी को समझ आयी
एक जाल की तरह कभी
कभी आज़ाद पतंग
कभी रेशम की डोर
कभी रस्सी का फंदा
हँसना भी दुभर
रोना भी गुनाह
जाने क्या चाहते है लोग
अपनेपन की आड़ में
ये कैसी जलन
उलझन है कैसी
रिश्तों की पहेली न सुलझे
उम्र निकलती जा रही है
मनाने में लोगों को
काश मेरे मन का भी मंथन किया होता
स्वार्थी अपनों ने अगर प्यार समझा होता
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